विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस: सोशल मीडिया की गिरफ्त में युवा, झाड़-फूंक और सामाजिक झिझक बिगाड़ रही हालात
भागदौड़ भरी जिंदगी और डिजिटल दौर में मानसिक तनाव (Stress) और अवसाद (Depression) धीरे-धीरे महामारी का रूप ले रहे हैं। देश की युवा आबादी सबसे अधिक मानसिक समस्याओं की चपेट में आ रही है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह सोशल मीडिया की लत, अनियंत्रित स्क्रीन टाइम और अपनी तुलना दूसरों से करना है।
दूसरी ओर, हमारे समाज में आज भी मानसिक बीमारी को किसी डॉक्टरी इलाज के बजाय 'ऊपरी साया' या 'टोना-टोटका' मानने की कुप्रथा हावी है। समय पर इलाज न मिलने और बीमारी छिपाने के चक्कर में मरीज की हालत गंभीर होती जा रही है।
आज का युवा दिन का एक बड़ा हिस्सा स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ऐप्स पर बिता रहा है। रील्स और पोस्ट में दिखने वाली दूसरों की 'परफेक्ट जिंदगी' से अपनी लाइफ की तुलना करने की आदत युवाओं में हीन भावना, चिड़चिड़ापन और अकेलापन भर रही है। देर रात तक स्क्रीन देखने के कारण युवाओं की नींद उड़ गई है, जिसका सीधा असर उनके स्वभाव और मानसिक संतुलन पर पड़ रहा है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, ध्यान केंद्रित न होना और हमेशा बेचैनी महसूस करना इसके प्रमुख शुरुआती लक्षण हैं।
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता की भारी कमी के कारण आज भी गांवों और कस्बों में किसी व्यक्ति के व्यवहार में बदलाव आने पर उसे तांत्रिक या झाड़-फूंक करने वालों के पास ले जाया जाता है। 'ऊपरी साया' मानकर समय गंवाने के कारण अवसाद या शिजोफ्रेनिया जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों की स्थिति अत्यधिक नाजुक हो जाती है। जब तक मरीज को किसी मनोचिकित्सक के पास लाया जाता है, तब तक बीमारी काफी बढ़ चुकी होती है।
अवसाद से जूझ रहे लोग अक्सर अपनी बीमारी को अपनों से भी छिपाते हैं। समाज में मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को 'पागल' करार दिए जाने का डर इतना गहरा है कि लोग परामर्श (Counselling) लेने से कतराते हैं। बीमारी को छिपाने की यह कोशिश अंदर ही अंदर इंसान को खोखला कर देती है।

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